ग्वालियर | भारत के इतिहास में रुचि रखने वाले मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर को जरूर जानते होंगे। अकबर के दरबार के महान संगीतकार तानसेन, 15 वी शताब्दी में भारत की सबसे सुंदर रानी 'मृगनयनी' की प्रेम कथा, महारानी लक्ष्मी बाई का बलिदान और भारत की राजनीति में सिंधिया राजघराना यह सब कुछ और ऐसे ही दर्जनों ऐतिहासिक महत्व ग्वालियर की संपत्ति है। क्या आप जानते हैं 104 साल पहले यह एक ऐसा शहर था जहां लगभग हर साल अकाल पड़ जाता था। लोग यहां रहना पसंद नहीं करते थे। आबादी मात्र 50 हजार थी, जिसमें से ज्यादातर लोग गर्मी के मौसम में पलायन कर जाते थे। सवाल यह है कि 104 साल पहले ऐसा क्या हुआ कि फिर कभी ग्वालियर में अकाल नहीं पड़ा। आइए पढ़ते हैं एक महान राजा और प्रतिभाशाली इंजीनियर की कहानी। जिसने ग्वालियर की किस्मत बदल दी।

 

ग्वालियर के तिघरा जलाशय खूब बनाने वाले इंजीनियर का नाम क्या था

ग्वालियर शहर की लाइफलाइन कहे जाने वाले 104 साल पुराने तिघरा जलाशय का निर्माण 1916 में उस समय के ग्वालियर स्टेट के तत्कालीन प्रमुख माधौ महाराज ने मैसूर रियासत के चीफ इंजीनियर सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या की मदद से बनवाया था। जिन्हें महान इंजीनियर एम विश्वेश्वरैया के नाम से भी जाना जाता है। श्री विश्वेश्वर या उस समय के भारत के सर्वश्रेष्ठ बांध निर्माता थे। इसमें विश्वेश्वरैया ने खुद के ईजाद किए फ्लड गेट लगाए थे, जिन्हें बाद में विश्वेश्वरैया गेट के नाम से पेटेंट भी कराया गया था। तिघरा बांध में 100 साल पहले लगे ये गेट आज भी कारगर साबित हो रहे हैं।

 

ग्वालियर के तिघरा बांध की क्षमता कितनी है 

करीब 24 मीटर ऊंचे और 1341 मीटर लंबे इस बांध की क्षमता 4.8 मिलियन क्यूबिक फीट है। वर्ष 1916 में शहर की जनसंख्या 50 हजार के लगभग थी तथा यह बांध करीब 3 लाख आबादी को ध्यान में रखकर बनाया गया था। आज शहर की आबादी लगभग 15 लाख है। वर्तमान में आधे से अधिक शहर को तिघरा से पेयजल की आपूर्ति होती है। मध्यप्रदेश सरकार ने ग्वालियर शहर की पेयजल आपूर्ति सुचारू बनाए रखने के लिये अपर ककैटो, ककैटो एवं पहसारी से तिघरा जलाशय को भरने की व्यवस्था की है। 

 

ग्वालियर में तिघरा बांध क्यों बनाया गया, क्या ग्वालियर में कभी अकाल भी पढ़ता था

तत्कालीन ग्वालियर रियासत के लिए 19 वीं शताब्दी का उत्तरार्ध और 20 वीं शताब्दी की शुरूआत अकालों का अभिशाप लेकर आई थी। रियासत में जंगल भी बहुत थे, नदियां भी पर्याप्त थीं, लेकिन ऐसा कोई साधन नहीं था कि रियासत के जल संसाधनों को आपातकाल के लिए संग्रहित कर रखा जा सके। लिहाजा तत्कालीन महाराजा माधौ महाराज ने फैसला किया कि शहर की प्यास बुझाने और आपातकाल में किसानों को पानी देने लिए एक बड़ा बांध बनाया जाए। नतीजतन 1916 में तिघरा बांध बनाया गया।